एक पुरानी कहावत है कि “नेवर जज अ बुक बाय इट्स कवर”

वैसे मैं इस लाइन से ज्यादा इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता, कारण यह है की मेरा मानना है कि गांधी जी की जीवनी वाली किताब पर फोटो भी उन्हीं की होनी चाहिए न की नेहरू जी की। जब मुझे “यूपी 65” पढ़ने को मिली तो मुझे लगा था कि यह कोई ट्रेवल से रिलेटेड किताब होगी और जब एक दोस्त ने बताया कि इस किताब के लेखक आईआईटी के पूर्व छात्र हैं तो दिमाग में तुरंत चेतन भगत साहब आये और मैंने बुक को जज कर लिया। पर यह किताब अलग ही निकली, बिलकुल अलग।

 

मेरा यकीन मानिए की अगर आप कभी यूपी में रहे हैं तो यह किताब आपको बहुत रास आने वाली है।

पहले कैरेक्टर्स को जान लेते हैं-

किताब में वैसे तो बहुत से कैरेक्टर हैं, बहुत से मतलब की बहुत सारे। याद रखना मुश्किल हो जाता है कि यह कौन था और वह कौन था। पर किताब में जो करैक्टर मुझे याद रह गए और शायद हमेशा याद रहेंगे वो हैं-

  1.  निशांत– निशांत किताब का मुख्य किरदार है और पूरी कहानी इसी के नजरों से लिखी गयी है।
  2.  शुभ्रा– निशांत की गर्लफ्रेंड। निशांत साहब के दिल की धड़कन। पूरी कहानी पढ़ के तो ऐसा ही लगता है।
  3.  कबाड़ी– अल्टीमेट करैक्टर, हर मर्ज की दवा रखने वाला इंसान। मेरा पसंदीदा।
  4.  पांडे– निशांत का रूममेट। निशांत को उसकी दुनिया से निकाल कर दूसरी दुनिया तक ऊँगली पकड़ कर ले जाने वाला इंसान।
  5.  अखिल– बस इसलिए क्योंकि उसने नाइन्थ क्लास में सेक्स किया था। पूरी किताब में वो इस अचीवमेंट को लेकर हाइलाइटेड है।
  6. अनिरबन दास– ऐसा प्रोफ़ेसर जो इसलिए रोता है क्योंकि उसने पहली बार किसी स्टूडेंट को फेल किया है।
  7. भैरवनाथ जी– मुमुक्ष भवन का कर्ता-धर्ता या फिर कहिये तो मैनेजर । मेरे दिल के करीब। माहौल से उलट एकदम इमोशनल इंसान। आँखों में आंसू भरे किसी का इंतजार करते इस बुजुर्ग का रोल थोड़ा लंबा रखना चाहिए था।

इनलोगों के अलावा और कोई याद नहीं है क्योंकि बाकी सब भीड़ की तरह आते हैं कहानी में और अपना काम कर के चले जाते हैं।

बात करते हैं कहानी की।

कहानी है निशांत की और उसके सफर की, एक यादगार सफर की। उसके दोस्तों की कहानी जो उसके साथ हैं, जो अनजाने में ही सही उसे उसकी प्रेमिका से मिलवा देते हैं। कहानी है BHU की, वहाँ से जुड़ी यादों की। कहानी है हर उस बन्दे की जो कभी भी हॉस्टल में रहा हो या फिर ज़िन्दगी में एक बार भी कभी बनारस गया हो।

मैं एक बार बनारस गया था, 1 महीने रुका भी था और बनारस शहर है ही ऐसा जिससे आपको प्यार हो जाएगा। अगर आप ‘दुर्भाग्यवश’ कभी नहीं जा पाए हैं बनारस तो इस किताब को पढ़िए, आपको आधा बनारस यह किताब घुमा देगी।

 

किताब में निशांत के BHU में बिताये उसके यादगार पल, उसके परिवर्तन की कहानी है।

क्या पसंद नहीं आया।

इस किताब में जहाँ मैं सबसे ज्यादा कन्फ्यूज्ड रहा हूँ वो है इसका टाइमजोन को लेकर। ये किताब किस साल की कहानी बता रही है इसे समझना मेरे लिए मुश्किल सा हो गया। कहानी में एक जगह बताया जा रहा है कि निशांत अपने कमरे को सही कर रहा है, उसने टेबल पर किताबें रखीं और उसके साइड में एक टेबल लैंपटेबल लैंप का जिक्र आते ही मुझे लगा की कहानी 90s की है लेकिन अगले पल उसका दोस्त पांडे रणवीर दीपिका की बात करता है और मेरा दिमाग फुदक कर 2007 के आसपास पहुँच जाता है। फिर एक जगह निशांत शुभ्रा को SMS भेज रहा है और पांडे अपनी गर्लफ्रेंड को प्रेमपत्र लिख रहा है लेकिन फिर एक जगह इनटॉलरेंस की बात आती है और कलबुर्गी की हत्या की बात भी आती है। कुल मिला के पूरी किताब में मैं यह नहीं समझ पाया कि सचान जी किस साल की बात कर रहे हैं। बस यही चीज खटकी मुझे।

क्या अच्छा है ?

मुझे सौंपी गयी थी यह किताब जस्ट अनअदर हिंदी किताब की तरह लेकिन इस किताब ने हिंदी भाषा को लेकर मेरी सोच ही बदल कर रख दी है। पूरी बनारसिया शैली में लिखी हुई यह किताब पढ़ने का एक अलग ही मजा देती है। आपको एक पल को हॉस्टल के कारनामों से गुदगुदाती है तो फिर अगले पल आपको मुमुक्ष भवन ले जाती है जहाँ इतनी बड़ी बातें कह दी जाती हैं कि आप सीरियस भी हो जाते हो। किताब को पढ़ते  वक़्त आप भावनाओं के रोलर कोस्टर पर चढ़ जाएंगे। सबसे खास बात इस किताब की यह है कि हर घटना को बहुत हीं डिटेल के साथ लिखा गया है। आपके सामने हर सिचुएशन, हर घटना का 3डी सिनेमा चलने लगेगा।

 

मैं निखिल सचान जी का शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने यह किताब लिखी और खुले दिल से लिखी।

 

क्योंकि यह किताब नए लेखकों को एक नया तरीका दे रही है कि कैसे हिंदी को मजेदार बनाया जा सकता है। हिंदी बोरिंग नहीं है। एक बात मैं दावे के साथ कहूंगा कि इस किताब को पढ़ने के बाद आप महसूस करेंगे की अच्छा हुआ यह किताब हिंदी में ही लिखी गयी क्योंकि अंग्रेजी में इस किताब को लिखने की कल्पना भी नहीं किया जा सकता। मेरा ईश्वर से यही कामना है की निखिल जी लिखते रहें क्योंकि उनका लिखना मरती हिंदी को जीवन देने के लिए एक दवा का काम कर रहा है। अपनी लाइब्रेरी में सजाने लायक किताब। एक बार पढ़ेंगे तो दुबारा भी पढ़ने का मन करेगा। जरूर पढ़ें।

*यह रिव्यू एक आम पाठक की नजर से किया गया है न की एक आलोचक की नजर से।

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