देश की हवा खराब हो गयी है, इस हवा में जहर घुल गया है।

मैं बात सिर्फ सांस लेने वाले हवा की ही नहीं बल्कि मानसिक सोच वाली हवा की भी कर रहा हूँ। देश में क्राइम की बढ़ती संख्या में एक बेहद डराने वाला आंकड़ा जुड़ गया है और वह है जुवेनाइल्स यानी की नाबालिगों की क्राइम में पार्टिसिपेशन की बढ़ती संख्या।

बच्चे मन के सच्चे और दिल के साफ़ कहे जाते हैं, पर हमारे देश में इस साफ़ दिल में गंदगी उतर रही है। पूरे देश में ऐसा हो रहा है कि नाबालिगों के द्वारा किये क्राइम्स की संख्या बढ़ रही है।

 

रयान इंटरनेशनल स्कूल में प्रद्युम्न की मौत हुई। घटना काफी परेशान और डराने वाली थी, कंडक्टर पर आरोप लगे। कंडक्टर ने गुनाह कबूल कर लिए लेकिन फिर बाद में बयान से पलट गया। सबसे परेशान मुझे आज की खबर ने कर दिया जब इस अमानवीय घटना में गुनहगार के रूप में एक बच्चे का नाम आया। ऐसा नहीं है कि किसी हाई प्रोफाइल केस में यह पहली बार किसी नाबालिग का नाम आया हो, इससे पहले ‘निर्भया’ बालात्कार वाले मामले में भी एक नाबालिग का नाम आया था, जिसे बाद में सिलाई मसीन के साथ छोड़ दिया गया था। यह तो कुछ ऐसे मामले हैं जो हाईलाइट हुए हैं लेकिन ऐसे मामलों की ढ़ेर लगी हुई है। जैसे करकरडुमा में हुए गुड़िया गैंग रेप में 2 दोषियों में से एक नाबालिग था। उत्तरप्रदेश में 06 फरवरी की एक घटना जिसमें एक 9 साल की बच्ची का बलातकार करने वाला दोषी 16 साल का लड़का था।


अगर नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ो पर नज़र डालें तो 2010 से 2014 के बीच नाबालिगों के द्वारा किये गए क्राइम की संख्या में 47 प्रतिशत का जबरदस्त उछाल देखने को मिला। देश भर में होने वाले क्राइम्स में नाबालिगों की हिस्सेदारी 1.2 प्रतिशत की है। ये आंकड़े हमें परेशान करते हैं और सवाल उठाते हैं बच्चों की परवरिश के माहौल पर।

बच्चे एक खाली कैसेट की तरह होते हैं जिसमें संगीत या शोर आसपास का माहौल और उस से भी पहले उसके माँ बाप भरते हैं। हमें इस भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी का एक हिस्सा अपने बच्चों को भी देना होगा। हमें यह देखते रहना होगा की वो क्या कर रहा है, उसकी मित्रमंडली कैसी है, उसके व्यवहार में क्या बदलाव आ रहा है। यह जिम्मेदारी सिर्फ उसके माँ बाप की ही नहीं बल्कि पूरे समाज की है। क्योंकि समय रहते अगर इसके लिए कोई सही कदम नहीं उठाया गया तो यह रोग भीमकाय रूप ले लेगा, जिसके परिणाम पुरे देश को भुगतने होंगे।

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