यूँ तो मैं आमतौर पर कवितायें पढता नहीं हूँ. पर कुछ दिनों पहले एक किताब मिली मुझे पढने को, नाम है “रंगों में बेरंग”. फैजान खान की यह किताब जब मुझे मिली तब मैं बस यही सोच रहा था की इसके बारे में क्या लिखूं. मेरे हाथ में जब यह किताब आई तब मैंने अपनी आदत के अनुसार इस किताब के भी पहले २ या ३ पन्ने पलटे. किताब का पहला शीर्षक जो की इस किताब और फैजान जी के बारे में था वो है “असमंजस में”.

किताब में क्या है ?

यह शीर्षक अपने आप में काफी था मुझे इस किताब को पढने के लिए उत्सुक करने को. इसे किताब भर ही कहना शायद सही न हो क्योंकि जितने देर हमारी और फैजान साहब की बात हुई और उसके बाद जितना मैंने इस किताब को और उन्हें समझा उससे आप बस यह समझ लीजिये की इस किताब में जो कवितायें या नज़्म है और आपको वो जितनी पढने के बाद समझ आएगी आप उतना ही फैजान जी को और उनकी ज़िन्दगी को समझ लीजियेगा. वैसे तो इस किताब में कुल 95 कवितायें हैं और सब के बारे में मैं बता भी नहीं पाऊंगा और बताऊंगा भी नहीं क्योंकि कुछ आपके पढने के लिए भी छोड़ना जरुरी है, लेकिन कुछ कविताओं का जिक्र जरुर करना चाहूँगा.

 

ये वो कवितायें हैं जो गुदगुदी सी करती हैं, सोचने पर मजबूर करती हैं, आप उनको पढ़ कर खो जाते हैं और एक मिनट को आँख बंद कर के आप कविता में बताये गए उस पल को महसूस करना चाहते हैं.

 

पहली कविता जो की पहले नंबर पर है किताब में भी और मेरी पसंदीदा वाले लिस्ट में भी.

“तलाश”

“हमको तो चाहिए कोई अपनों-सा

जो जी लेता हो ज़िन्दगी को सपनों-सा……….”

 तलाश है किसी अपने की, अपने जैसे की. वैसे अपने जैसा अपना ही तो हुआ. जो मेरी छोटी सी ज़िन्दगी में अपनी बड़ी सी भूमिका निभाये. बिलकुल मेरे जैसा हो, थोडा एडजस्ट भी करना हो तो कर ले एडजस्ट, पर चेहरे पर यह दिखाई न दे जिसके. जो मेरी छोटी सी ज़िन्दगी को खुशियों के पल दे. मुझे और मेरे घर को जो बनाए अपने हाथों से और अधूरे से पूरा करे इसे अपनी बातों से और खुद से. ऐसे किसी की तलाश.

 “……..सब थे मशगूल अपनी साइकिलों की तिल्लियों को चमकाने में

सोचा न था कभी

चलना होगा उस पगडण्डी पर

अकेले

कोना-कोना सा”  

सब तो यही सोचते हैं, पर उनको पता नहीं होता है की सबको नहीं मिलता है कोई अपना सा. ख्वाब तो सब पाले बैठे होते हैं पर ज़िन्दगी का सफ़र सबके लिए सपाट और चिकनी हाईवे जैसी नहीं होती और बहुतों का सफ़र अकेले उन उबर-खाबर पगडंडियों से होकर पूरा होता है.

“खरगोश”

यह कविता ख़ास है, ख़ास दो मायनों में. एक तो यह कविता हमें खुद फैज़ान जी से सुनने को मिली और दूसरी वजह यह कविता उस मुद्दे को छेड़ती है जिसे सुन कर अक्सर शर्म से हम अपनी नजरें झुका लेते हैं.

“गर शक हो मुझ पर

तो अपने आप से पूछ लो

या अपने इंसान से पूछ लो

नहीं गर खुद पर भी यकीं

तो अपने भगवान् से पूछ लो……”  

पूरी कविता बच्चों के शोषण और बलात्कार के गंभीर मुद्दे के चारों ओर घुमती है. इस कविता का बखान मैं नहीं करूँगा क्योंकि इसके शब्द चोट करते हैं दिमाग पर. मेरे पास वो शब्द नहीं हैं की मैं इसका सार लिख पाऊं. इसलिए एक सलाह दूंगा की इसको आप खुद पढ़िए और महसूस कीजिये जो मैंने इसको पढने के बाद किया है.

एक शब्द है मेरे पास इस कविता के लिए, और वो है “निःशब्द”.

“घर से स्कूल”

“प्यार जब हुआ

जब इस चिड़िया का नाम भी नहीं सुना था

तुम्हें देखा तो सोचा ये क्या हुआ?

सारा जहाँ कहाँ खो गया?……….”

स्कूल वाला प्यार. सबको होता है. मुझे भी हुआ था शायद. शायद फैजान जी को भी हुआ होगा क्योंकि इतनी बारीकी से लिखी हुई ये कविता है, यह बिना एक्सपीरियंस के तो मुश्किल है लिखना. आप अब ध्यान दीजिये शब्दों पर,

”…स्कूल से घर जाकर सिर्फ ये सोचता की कब सुबह होगी.

कब मैं प्रेयर के बहाने पीछे खड़े होकर बालों की खुसबू ले पाऊंगा

कब मैं शैतानी कर के तुम्हारे हाथों से अपना नाम

ब्लैकबोर्ड पर लिखवाऊंगा…..”

इस कविता को पढ़ कर मैं बस पुरे समय मुस्कुराता ही रहा और ख़्वाबों में स्कूल पहुँच कर उसको ढूँढने की कोशिश करने लगा. आप अगर कविताओं में डूब कर उसको पढ़ते हैं तब मेरा यकीं मानिए आपके साथ भी यही होगा. अब इसे फैजान जी की लेखनी का कमाल कहिये या फिर प्यार व्यार को लेकर स्ट्रोंग वाला इमोशन को जिम्मेदार ठहराइए पर दिल में गुदगुदी करती है यह कविता. उस समय एक प्यार भी रहता है और प्यार खोने का डर भी रहता है और इनदोनो का घालमेल सब चौपट करवा देता है. फैजान जी भी इस कविता में चिट्ठी नहीं दे पाते हैं उसको, मैं भी नहीं दे पाया था.

“…मैं स्कूल से कभी गया ही नहीं

ये चिट्ठी कभी बैग में डाली ही नहीं.

लेकिन मैंने तुम्हारा नाम जरुर

अपने घर के किसी कोने में पेंसिल से लिख दिया है

किसी को बताना नहीं.”

स्कूल ख़त्म हो जाता है पर हम स्कूल में ही रह जाते हैं. उसकी यादों को समेटे और अपने बचपन को जीते. अपना लंच शेयर करते और दोस्तों के साथ पायलट या पेंटर बनने का सपना देखते. हम बड़े तो हो जाते हैं पर स्कूल की उस चौखट के इस पार कभी नहीं आ पाते. वो दिन कमाल के थे. हाँ, आज के जमाने में कहिये तो अपनी “क्रश” को भी कभी बता भी नहीं पाते की हम उसे चाहते हैं. बस दिल के कोने में उस बचपन की यादों को समेट कर एक छोटा सा किस्सा लिख लेते हैं उसकी दीवार पर. जिसे हम खुद ही कभी कभार चुपके से अनजाने ही किसी ख़याल में खोये हुए पढ़ कर मुस्कुरा देते हैं और जब कोई पूछता है की क्या हुआ क्यों हस रहे हो तब हम जवाब देते हैं कुछ नहीं बस ऐसे ही.

 

बस ऐसी ही कवितायें मिलेंगी आपको फैजान जी की इस किताब में.

बहुत सी कवितायें और हैं जो की काफी पसंद आयीं जैसे की “मुरसली के बीज”, “अभी छोटे हैं”, “वो लिहाज”, “तुम मौत नहीं” और भी कई. फैजान जी से हमने पूछा था की आपने इस किताब का नाम रंगों में बेरंग क्यों रखा? तब उन्होंने हमसे कहा था की आप जब इसको पढियेगा तब आपको पता चल जाएगा. मैंने पूरी किताब पढ़ ली और मैं इस टाइटल को जस्टिफाई नहीं कर पाया. आपकी कवितायें और लेखनी तो कैनवास पर उस चटख रंग की तरह है जो अलग से नज़र आती हैं और भविष्य में दूर से नज़र आने वाली है. खैर, अच्छा ही है की समझ नहीं आया क्योंकि यह हमें अगली बार मिलने पर ढेर सारी बातें करने का मौका देगी.

एक बात और जो अंत में आपसे कहना चाहूँगा फैजान जी और वो यह है की वो जो आपने किताब में अपने बारे में लिखा है न “असमंजस में” उस टाइटल को बदल कर “कन्फर्म हूँ” कर दीजिये. कन्फर्म मेरी तरफ से की आप अच्छा लिखते हैं और बस ऐसे ही लिखते रहें. आपकी अगली किताब का इंतज़ार रहेगा. जिन्होंने नहीं पढ़ी है इस किताब को उनसे गुजारिश है की भई आज ही पढो इसको और जरुर पढो.

अच्छी किताब.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here