एक क्रिकेट के कमेन्टेटर हैं, नाम है आकाश चोपड़ा. आये दिन आपको भारत के किसी क्रिकेट के खेल के वक़्त गेमप्लान करते नजर आ जायेंगे. उनकी एक ख़ास बात है. अक्सर वो खिलाड़ियों को मिडिल नाम देते रहते हैं जैसे की रोहित शर्मा को रो’हिटमैन’ शर्मा और विराट कोहली को विराट ‘रन मशीन’ कोहली.

खैर उनके इस प्रतिभा का इस्तेमाल बॉलीवुड में होता तो और किसी का तो नहीं पता पर संजय लीला भंसाली अपना एक मिडिल नाम पा चुके होते. नाम होता संजय ‘विवादलीला’ भंसाली. ऐसा इसलिए क्योंकि संजय लीला साहब के हर फिल्म के आने से पहले आता है एक विवाद. विवादों के साथ उनका नाम कुछ इस तरह जुड़ गया है जैसे रोमियो का जूलिएट और हीर का रांझे के साथ जुड़ा है.

पद्मावती जब बन ही रही थी तभी लात घूंसे चलने पर यह फिल्म और राजपूत करणी सेना का विवाद पहली बार सुर्ख़ियों में आया. रोज कुछ न कुछ सुनने को मिल ही जाता है. ट्विटर के नल्लों को भी साथ ही साथ दिन भर बीजी रहने का मौका दे रहे हैं. मामला गरम है. हाल में नाक काटने और जिंदा जलाने के अलावा १० तरह की धमकियाँ और भी दी जा चुकी हैं. अरविन्द केजरीवाल को टक्कर देने के लिए भाजपा के राजनेता भी फिल्मों के रिव्यु देने में अपना नाम लिखवाने को आतुर दिख रहे हैं. शिव राज सिंह चौहान ने तो बिना फिल्म आये और उसे बिना जाने ही इस फिल्म को अपने तीसरी आँख के सहारे देख कर इसे मध्यप्रदेश में बैन कर दिया है. वसुंधरा राजे, योगी आदित्यनाथ और स्मृति इरानी जैसे लोग भी राजनीति को छोड़ फिल्म नीति का नया अध्याय लिख रहे हैं.

सिर्फ राजनेता ही नहीं फ़िल्मी हस्तियों के साथ साथ पत्रकार भी ट्विटर और टीवी चेनल्स पर काफी मुंह फाड़ रहे हैं. काफी टट्टी और काफी गंगाजल छींटा जा रहा है पुरे मामले पर. सब मिल कर अब माहौल में बदबू फैलाने लगी है. लेकिन इस बदबू के बीच एक जोड़े का अचानक से  पेट खराब हो गया है और उन्होंने भी गंद मचानी शुरू कर दी है. यह जोड़ी है जावेद अख्तर साहब और शबाना आज़मी जी की. जावेद अख्तर साहब यूँ तो हमेशा से हर संवेदनशील मुद्दे पर अपनी राय रखते आये हैं और अपनी इस परंपरा को उन्होंने पद्मावती के विवाद की बहती गटर में उतर कर काफी ही ख़ूबसूरती से निभाया है. दोनों पति पत्नी गए थे इंडिया टुडे के पत्रकार राजदीप सरदेसाई को इंटरव्यू देने, मुद्दा था पद्मावती का. बात भी ढंग की ही हो रही थी. पर जावेद अख्तर साहब जज्बातों में बह गए और एक अनाप शनाप बयान दे दिया. उन्होंने कहा की यह राजपूत और रजवाड़े तो ज़िन्दगी भर अंग्रेजों के तलवे चाटते नजर आये हैं. अगर जोश दिखाना था तो उस समय दिखाते. आज चिल्ला कर क्या होगा?. राजदीप सरदेसाई जी ने इस बयान को सुना कर उन्हें चेताया की अब तो आपके पीछे करणी सेना लगने वाली है. अख्तर साहब ने इसके जवाब में कहा की मुझे फर्क नहीं पड़ता की येलोग मेरे पीछे लगें या आगे लगें. मैं एक आम राजपूत की बात तो सुन सकता हूँ पर किसी रजवाड़े की नहीं सुनूंगा.

जावेद साहब यकीन मानिए बहुत ही गन्दा, आपने अपनी इज्जत पर इस बयान से एक दाग लगाया है. मैं एक राजपूत तो नहीं पर हर जाति की इज्जत बराबर करता हूँ. सर ऐसा है न, की मुझे आपकी इस बात पर आपत्ति है. आप चाहे बहुत ऊँचे मुकाम पर हों या फिर आप कोई बहुत बड़े बुद्धिजीवी ही क्यों न हों, एक जातिगत टिपण्णी कहीं से भी शोभनीय नहीं है. मुझे या आपको या दुनिया के किसी भी इंसान को यह हक बिलकुल भी नहीं है की वो किसी पर भी जातिगत टिप्पणी करे. जातिगत टिपण्णी चाहे किसी भी जाति पर हो, भले ही वो छोटी जाति हो या फिर एक बड़ी जाति, बिलकुल ही गलत है. ऐसे अगर कुछ मुगलों के कुकृत्य को देखते हुए मैं आपको भी अगर उस दायरे में लाकर खड़ा कर दूं की आपलोगों ने तो हमेशा शोषण ही किया है और आप लोग तो आक्रांति हो तो कैसा लगेगा? आप विवाद पर बोलते, पद्मावती फिल्म के बारे में बोलते सब सही था. पर जातिगत टिपण्णी, आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी सर. मेरा मानना है की अभिव्यक्ति की आजादी है, सबको है, पर उसको एक दायरे के पार ले जाना उस आजादी का गलत इस्तेमाल है. मैं आप से उम्मीद करता हूँ की शायद आप मेरी इस बात को समझेंगे और राजपूत समाज से माफ़ी भी मांगेंगे.

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