आज बाल दिवस है। वैसे किसको फ़र्क़ पड़ता है के बाल दिवस आया है जब तक की बाल दिवस वाली छुट्टी में कोई लोचा न हो जाए। है न? बाल दिवस बस एक छुट्टी वाला दिन बन कर रह गया है हम लोगों के लिए। चाचा नेहरू का बर्थडे वाला दिन। छुट्टी से जरुरी इस भाग दौड़ वाली ज़िन्दगी में और क्या हो सकता है। पर काश, काश की ऐसा न होता। काश ये होता की हम एक टारगेट ले कर चलते की आने वाले 5 बाल दिवस से पहले हम एक भी बाल मजदूर या फिर कोई भूखा बच्चा इस देश में नहीं रहने देंगे। अरे भूखे बच्चे की बात छोड़िये, ढंग से ऑक्सीजन तो मिल नहीं पा रहा अस्पतालों में।

असल मायनों में देखा जाए तो हमें हक़ ही नहीं की हमलोग बाल दिवस मनाएं। किस बात का बाल दिवस भाई, क्यों मना रहे हैं? नेहरू जी के जन्मदिन के अलावा और कोई कारण?

कितने लोग इसकी परवाह करते हैं के अपने देश में ये भीख मांगते बच्चे पढ़ने क्यों नहीं जाते और कितने लोग इस बात की परवाह करते हैं कि वो पड़ोस के दूकान में काम करने वाला छोटू बाल मजदुर है क्या? आपको पता है ऐसा क्यों है और हमलोग ऐसे क्यों हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि हम बस अपनी ज़िन्दगी जीना चाहते हैं हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता की कौन क्या कर रहा है। हमलोग भले ही देश के बारे में बहुत कुछ सोचते हों और बहुत कुछ करना चाहते हों पर जब एक्शन की बात आती है न तो सन्नाटा पसरा जाता है। हमें हिम्मत और फुर्सत दोनों ही नहीं होती के अपनी तरफ से कुछ इस देश के लिए कर सकें।

पर आपको पता है हम अपनी तरफ से अगर इस देश को सच में कुछ दे सकते हैं तो वो है बेहतर बच्चों का भविष्य। क्योंकि यही बच्चे इस देश का भविष्य बनाएंगे। आँखें बंद कर लेने से शुतुरमुर्ग का खतरा नहीं टल जाता, ये उसकी बेवकूफी की निशानी है। हमें भी आँखें खोलनी होगी और देखना होगा अपने चारों तरफ की किस बच्चे को मदद की जरुरत है। क्योंकि आप अगर इधर आँखे बंद करते हैं न तो उस तरफ एक बचपन मरता है। इस बचपन को मत मरने दीजिये। क्योंकि हर बच्चे का मरता बचपन एक उदास समाज को पैदा करेगा और बच्चे बिना बचपन के वैसे ही लगते हैं जैसे बिना पानी वाला तालाब, या फिर बिना रंगीन पंखों के एक मोर, या फिर बिना नमक की सब्जी। इसलिए बचपन को बचाइये, इन बच्चों को नयी राह दिखाइए और अगर हम और आपने इन सड़क पर घूमने वाले बच्चों में से एक बच्चे को भी पूरी ज़िन्दगी में अपनी अपनी तरफ से एक लायक इंसान बना दिया तो यकीन मानिए देशहित और मानवहित में इससे बड़ा काम कुछ और हो ही नहीं सकता।

तब तक ये कविता सुनिये, शायद आपको समझाने में हम सफल हो पायें की किस हालात में हैं अपने ही देश के ये बच्चे और कैसे मर रहा है उनका बचपन।

 

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