19 दिसम्बर, एक खास दिन। खास इसलिए क्योंकि आज के ही दिन काकोरी कांड के लिए Ram Prasad Bismil, Ashfaqulla Khan और Thakur Roshan Singh को फांसी हुई थी। इन तीनों ने काकोरी मे अंग्रेजी हुकूमत के खजाने से भड़ी ट्रेन को लूटने मे प्रमुख भूमिका निभाई थी। तीनों मे देश को आजाद करवाने के लिए हद दर्जे का जुनून था।  भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान के लिए इन तीन भारतीय क्रांतिकारियों को आज भी याद किया जाता है.

क्या था काकोरी कांड?

काकोरी कांड, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में महत्वपूर्ण घटनाओं में से है। इसको अंजाम देने का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश प्रशासन को हिलाने और एक चेतावनी देने के लिए था। साथ ही साथ इस लूट मे मिला हुआ धन क्रांतिकारी गतिविधियों मे तेजी लाने के लिए उपयोग किया जाता।

कैसे मिले Ashfaqulla Khan और Ram Prasad Bismil?

अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां  ने बिस्मिल की कविता के बारे मे बहुत कुछ सुन रखा था। राम प्रसाद बिस्मिल की बहादुरी की कहानियां अशफ़ाक़ुल्लाह खान अक्सर अपने बड़े भाई के मुंह से सुनते रहते थे और जब राम प्रसाद बिस्मिल को मैनपुरी कांड मे फरार घोषित किया गया तब अशफाक़उल्ला खान की उनसे मिलने की इच्छा प्रबल हो गयी। उनकी उत्सुकता को देखते हुए ही उनके बड़े भाई ने उन्हें राम प्रसाद बिस्मिल से मिलवाया। बिस्मिलिल और अशफ़ाक़ुल्लाह एक निजी सभा में मिले थे और कविताओं में दिलचस्पी के कारण करीब आ गए। दोनों के सपने एक थे और उन्हे पूरा करने की कोशिश ने उनकी मित्रता को और प्रगाढ़ कर दिया था।

काकोरी कांड को अंजाम देने में दोषी पाए जाने के के बाद, 19 दिसंबर 1927 को राम प्रसाद बिस्मिल और रोशन सिंह के साथ, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां को फांसी दे दी गई थी. रोशन सिंह को पहले 1921-22 के असहयोग आंदोलन के दौरान बरेली शूटिंग मामले में सजा सुनाई गई थी. वह काकोरी साजिश में शामिल नहीं थे. उन्हें बिस्मिल और खान के साथ गिरफ्तार कर लिया गया था और फांसी दी गयी थी.

तो आज इन शहीदों को याद करते हुए अशफाक़उल्ला खान साहब की एक कविता आपलोगों के लिए यहाँ रख रहा हूँ। इसे पढ़िये, शायद इसे पढ़ने से आपको समझ मे आएगा की आजादी का पागलपन इनके दिलो दिमाग पर किस तरह हावी था। इन शहीदों को कच्चा चिट्ठा के पूरे समूह की ओर से शत शत नमन।

 

जाऊंगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ हीं जाएगा।
जाने किस दिन हिंदुस्तान, आजाद वतन कहलाएगा॥ 
बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं फिर आऊंगा फिर आऊंगा।
फिर आकर ऐ भारत माँ तुझको आजाद कराऊंगा॥
जी करता है, मैं भी कह दूँ ,पर मज़हब से बंध जाता हूँ ।
मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूँ ॥ 
हाँ ख़ुदा अगर मिल गया कहीं, अपनी झोली फैला दूँगा।
और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही माँगूँगा॥

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