भगत सिंह सीरीज का यह दूसरा आर्टिकल है, जिसे कच्चा-चिट्ठा के लिए लिख रहे हैं कुशाग्र अद्वैत 

पहला आर्टिकल पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ।

हिंदी का एक शब्द है- उत्कंठा (hankering)। Bhagat Singh को जानने की, समझने की उत्कंठा धीरे-धीरे प्रबल हो रही थी। मैं भगत सिंह को व्यक्ति की तरह नहीं वरन् व्यक्तित्व की तरह जानना चाहता था। मैं जानना/समझना चाहता था उन विचारों को जिन्होंने एक व्यक्ति के चोले को बसंती रंग दिया; जिनके लिए एक व्यक्ति अनासक्त भाव से, हँसते-हँसते फाँसी पर झूल गया।

प्रेम और क्रांति:

माना भगत सिंह मेरा पहला प्रेम हैं, मगर क्या महज़ प्रेम से आप कोई वैचारिक क्रांती ला सकते हैं ? हाँ, प्रेम क्रांति ला सकता है मगर, क्रांती के लिए मूल तत्व विचार हैं। हमारे विचार अध्ययन से परिपक्व होते हैं । संस्कारों से मुक्त और आत्मविवेक-युक्त अध्ययन। विचारों को पुख़्ता करने के लिए आपको विरोधाभासी विचारकों को पढ़ना चाहिए। कुछ देर उनके संग रहना चाहिए और उन्हें अपने दिमाग की भट्टी पर पकने देना चाहिए और फिर लेने चाहिए निर्णय कि आपकी जीवन-दिशा कौन-सा विचार तय करेगा।

लगाव हुआ कैसे ?

लगाव दो तरह का होता है —1)भावनात्मक 2) वैचारिक। आपका भावनात्मक जुड़ाव किसी से भी हो सकता है, उससे भी जिसके विचार आपसे भिन्न हो, परंतु वैचारिक जुड़ाव दुर्लभ है। शायद भावनाओं का ही बहाव था जो मेरे प्रेम को उनके विचारों तक पहुँचने के लिए उद्वेलित कर रहा था।

फोटो: गूगल

आज से लगभग पाँच साल पहले, मैं पहली बार एकदम अकेले सफर कर रहा था। ट्रेन का इंतजार कर रहा था जो कि एक-आध घण्टे लेट थी। मैंने बुक स्टाल का रुख़ किया। ज़ेब टटोली तो पाया कि मेरे पास मात्र सौ रुपए हैं। ये वो दौर था जब मैं कॉमिक्स पढ़ने से ऊब और उबर चुका था। मुझे कोई ऐसी किताब चाहिए जिससे मेरे पास आधे से ज़्यादा पैसा बचा रहे और जो सफ़र भी काट दे। मैं हर किताब का दाम देखकर रख दे रहा था। तभी मेरी नज़र कोने में रखी एक किताब पर पड़ी जिसपर भगत सिंह की तस्वीर थी। ‛Why I am an atheist’ … हाँ, यही नाम लिखा था। मुश्किल से पचास ग्राम की किताब थी। दाम था 35 रुपये। मैंने किताब खरीद ली। पूरे सफर के दौरान उसे दो बार पढ़ा। सब कुछ मेरी समझ से परे था (सिवाय कुछ कविताओं की पंक्तियों के)। किताब काफी दिनों तक एेसे ही अनछुई पड़ी रही। तीन साल पहले उठाई तो सब समझ आ रहा था।  तब से अब तक कई दफे पढ़ चुका हूँ।

कुछ बातें किताब से :

इस लेख को समस्त पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर पढ़ना चाहिए। यह लेख शुरु होता है एक सवाल से —
‛एक नया सवाल उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं अपनी हेकड़ी के कारण सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करता हूँ ?’
उनके साथियों को लगने लगा था कि भगत सिंह की नास्तिकता उनकी हेकड़ी है। भगत सिंह इस लेख में बड़े ही तार्किक और वैज्ञानिक ढ़ंग से अपनी नास्तिकता की वकालत कर रहे हैं। किताब में एक जगह भगत सिंह लिखते हैं—
‛मेरे दोस्तों के मुताबिक दिल्ली बम कांड और लाहौर षड्यंत्र कांड के कारण चले मुकदमों के दौरान मुझे जो बेवजह लोकप्रियता मिल गई है, शायद उसी ने मुझमें मिथ्या दंभ पैदा कर दिया है।’
इस पर वो कहते हैं—
‛मैं ना तो ईश्वर का प्रतिद्वंदी हूँ, न उसका अवतार, न स्वयं परमात्मा। पक्की बात है कि हेकड़ी ने मुझे एेसा सोचने के लिए प्रेरित नहीं किया है।’
वो आगे लिखते हैं—
‛मेरी नास्तिकता इतनी नई नहीं। मैंने तो ईश्वर को मानना तभी बंद कर दिया था जब मैं एक अज्ञात नौजवान था और मेरे उन मित्रों को मेरे अस्तित्व का पता भी नहीं था। कम-से-कम कॉलेज का एक छात्र एेसा एेसा अनुचित गर्व नहीं पाल सकता जो उसे नास्तिक बना दे।’

मेरा नास्तिक हो जाना :

भारत सदा से अध्यात्म, रहस्यवाद और धर्म आदि में उलझा था। एेसे में नास्तिक होना भारत के अनुरूप नहीं है। उनके दादा कट्टर आर्यसमाजी थे और पिता उदारवादी थे। परंतु कोई भी नास्तिक नहीं था। उनके पिता उन्हें रोज पूजा करने के लिए प्रोत्साहित करते थे। कॉलेज के दिनों वे बेहद ही शर्मीले स्वभाव के लड़के थे जो अपने भविष्य को लेकर निराशावादी खयालों में खोया रहता था। भगत सिंह डी.ए.वी स्कूल में प्रार्थनाओं के अलावा भी घंटों गायत्री मंत्र जपते थे। वे लिखते हैं — ‛उन दिनों मैं पूरा भगत था।’ ‘भगत’ का शाब्दिक अर्थ भक्त है।

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