आये दिन मैं फेसबुक पर अपने किसी मुस्लिम दोस्त के द्वारा फेसबुक पर शेयर की हुई सीरिया के लहुलुहान लोगों और बच्चों की तस्वीरें देख ही लेता हूँ और फेसबुक के शिष्टाचार के नाते उसे लिखे भी कर देता हूँ. लेकिन अक्सर कुछ बातें मुझे मन ही मन कचोटती हैं. काफी दिनों से कहना भी चाहता था और यह सोच भी रहा था तो आज जब डायरी के पन्नो ने भी फडफडा कर आवाज दी तो मैंने सोचा की मन की बात कर ही डालूं. वैसे भी मन की बात काफी ट्रेंड में है कुछ सालों से. ये जो लोग सीरिया के बच्चों के लिए आवाज उठा रहे हैं इसे मैं गलत नहीं मानता हूँ, ये होना चाहिए.

लेकिन क्या इनलोगों को सीरिया के साथ साथ बलूचिस्तान के उन बच्चों की तस्वीर नज़र नहीं आती जिनके लिए कोई आवाज़ उठाने को तैयार नहीं या फिर उन बच्चों की चीखें सीरिया में हो रहे उन बम धमाकों में दब जा रही हैं या फिर यह हो सकता है की हमलोग काफी ही दूरदृष्टि वाले इंसान हैं इसलिए हमें नजदीक के बलूचिस्तान के बच्चों के दर्द में वो बात नज़र नहीं आती है जो दूर के सीरिया में है. एक बात और भी हो सकती है और वो यह की हम इंसानों को भेंडचाल की आदत हो गयी है.

हम कितना भी कह लें की हम काफी ‘मॉड’ हो गए हैं या फिर खुद को इस तरह से रिप्रेजेंट करते हैं की भाईसाहब we are the one who thinks out of the box लेकिन सच्चाई यह है की हम उस भैंस की झुण्ड की तरह हैं जिसे जंगल में झुण्ड में साथ रहने से ही सुरक्षित महसूस होता है. झुण्ड ने कहा सीरिया तो सीरिया, झुण्ड ने कहा मयन्मार तो मयन्मार, झुण्ड ने कहा फलाना तो फलाना, झुण्ड ने कहा धिनाका तो धिनाका. हम कब खुद की आवाज़ उठाएंगे? हम कब अपनी बात रखेंगे? हम कब तक बस भीड़ का हिस्सा मात्र बन कर रहेंगे?

यह बातें इसलिए क्योंकि गुस्सा आता है जब किसी एक वर्ग के दर्द को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया जाता है. यह दोहरा चरित्र क्यों हमारे समाज का या फिर हमारे सोशल मीडिया समाज का? कहीं ऐसा तो नहीं की बात सिर्फ सीरिया में उन बच्चों के जिस्म से निकलने वाले लहू या लगे जख्म को दिखाने की नहीं बल्कि बात अमेरिका और रूस की दुनिया के सामने एक अलग छवि दिखाने की है. क्योंकि अगर ऐसा है तो पुतिन और ट्रम्प जी एक बम बलूचिस्तान पर भी गिराइए

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