पिछली बार ओलंपिक्स का खेल ब्राज़ील के रियो में हुआ था।

भारत ने अपना सबसे बड़ा खिलाड़ियों का दल भेजा था। कुल 117 खिलाड़ियों ने 15 खेलों में भाग लिया था। मैडल जीत के लाये थे बस 2 लोग, दोनों करोड़पति भी बन गए। खूब इनाम बरसे थे उन दोनों के ऊपर। पूरा देश खुश था, मैंने भी शायद तब ही टीवी पर पहली बार बैडमिंटन देखा था । रेसलिंग वाला मैच भी देखा था, साक्षी मलिक ने कांस्य जीता था।

सब खुश थे, बस एक आदमी से भारत की ख़ुशी बर्दाश्त नहीं हुई थी और वो थे पियर्स मॉर्गन।

एक इंग्लैंड के पत्रकार, खूब कोशिश करी उन्होंने भारत की खिंचाई करने की। बोलने लगे “इत्ता बड़ा देश, इत्ते सारे लोग फिर भी बस 2 मैडल और उसकी भी ख़ुशी मना रहे। शर्म करो भारत।” वो तो भला हो ट्विटर वीर ट्वीटेंद्र सहवाग जी और ट्रोल सेना का, जिन्होंने आड़े हाथ ले लिया था मॉर्गन बाबू को। मॉर्गन बाबू ने गलत लोगों से पंगा ले लिया, बहुत सुनाये गए थे लेकिन आज तक बाज नहीं आये। अभी भी कुछ न कुछ बोल ही देते हैं भारत को लेकर।

खैर मॉर्गन बाबू ने जो कहा था वो पढ़ कर गुस्सा करने से ज्यादा अच्छा होता की हम उसपर बैठ कर सोचते की उन्होंने क्या गलत कहा था। सच ही है न, भारत में 132 करोड़ लोग हैं फिर भी हम ओलिंपिक में मैडल लेकर नहीं आ पाते। क्या कारण हो सकता है? टैलेंट की कमी? व्यवस्था की कमी? क्या?

वैसे आप सोच रहे होंगे की क्या यार ये इंसान भी हद है, यहाँ श्रीलंका के साथ टेस्ट मैच होने वाला है और ये कहाँ ओलिंपिक को लेकर बैठ गया है। अभी कितना टाइम बचा हुआ है ओलिंपिक में, तब का तब सोचेंगे। अरे, आप घबराइये नहीं। मैं भी आपलोगों की तरह भारतीय ही हूँ, भारत मे ओलिंपिक को लेकर फैली कुव्यवस्था का गुस्सा एकदम ओलिंपिक के टाइम ही निकालूंगा और फिर जैसे ही ओलिंपिक खत्म, बस उसके बाद सिर्फ सचीन-सचिन, सचिन-सचिन।

हाँ तो आज मैंने ओलिंपिक की बात इसलिए छेड़ दी क्योंकि एक खबर आयी है झारखंड से। झारखंड में एक गोल्ड मेडलिस्ट हैं, 2008 के दक्षिण एशियाई देशों के सैफ आर्चरी गेम्स में उन्होंने भारत के लिए 2 गोल्ड मेडल्स जीते थे। खूब सुर्खियां बटोरी थी अशोक सोरेन जी ने तब। न्यूज़पेपर में छा गए थे और फिर गायब हो गए। कोई इनाम वगेरह नहीं दिए जाते इतनी सी चीज के लिए, इसलिए कोई इनाम नहीं दिया गया। हाँ तो अशोक सोरेन जी आजकल मजदूरी कर रहे हैं अपने परिवार का पेट भरने के, मनरेगा जिसमें 100 दिन का रोजगार मिलता है वो भी कर रहे हैं। बीबीसी हिंदी की मानें तो अशोक सोरेन ने अपने बड़े भाई सनातन को देखकर बचपन से ही तीरंदाज़ी शुरू कर दी थी। बाद में उन्होंने जेआरडी टाटा स्पोर्ट्स कॉप्लेक्स से तीरंदाज़ी का औपचारिक प्रशिक्षण लिया, यहां उन्हें मुफ्त में ट्रेनिंग मिल गयी। इसके बाद उन्होंने कई प्रतियोगिताओं मे हिस्सा लिया और कई पदक जीते।

लेकिन भैया क्या फायदा ये पदक जीत कर? क्रिकेट खेलते तो तुमको पूछते सब। तीरंदाजी वीरन्दाज़ी में 10-15 देशों के खिलाड़ियों को हरा कर गोल्ड जीत लिया तो क्या अब सर पर बिठा लें? अब बैठो हाथ में फावड़ा ले कर, खोदते रहो नदी नाले। हम तो बस जोश में तभी आएंगे जब ओलंपिक्स में मेडल्स नहीं आएंगे और खबरदार जो किसी ने हमारा मजाक उड़ाया। तब तक के लिए सिर्फ सचिन-सचिन, सचिन-सचिन।

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