बड़ी सी सायकल पर हर रोज स्कूल छोडना मुझे याद है। हर सुबह जूतों मे पॉलिश लगाना मुझे याद है। मेरे स्कूल मे बुधवार को सफ़ेद यूनिफ़ोर्म चलती थी। तो हर मंगलवार मेरे सफ़ेद जूते पहले से भी ज्यादा सफ़ेद हो जाया करते थे। समोसे के साथ रसगुल्ले मुझे बहुत पसंद थे।वो भी सफ़ेद वाले। हर रविवार, मैं शाम को यूं हीं इंतेजर करता था। उन तिकोने समोसो मे मुझे अपनी पूरी दुनिया मिल जाया करती थी, साबुत गोल।

पढ़ाई कराने के लिए अहले सुबह उठा दिया करते थे। कभी मन नहीं हुआ। हर बार बे मन से उठा करता था। उन दिनो हर सुबह बस पन्ने हीं पलटा करता था। लेकिन वो फिर भी कहते थे, पढ़ लो अभी वक़्त है। वो पापा थे। वो मेरा बचपन था। आज भी पापा हैं, पर मेरा बचपन थोड़ा भटक सा गया है। अब पापा से उन समोसों की आस नहीं होती है। वो बड़ी सी सायकल भी पापा ने बेच दी है। अब किताबें सिर्फ पन्ने पलटने के लिए हीं नहीं खुलते हैं। न हीं अब वो सफ़ेद जूते बचे हैं। पिछली बार पापा ने अपने जूते मुझे दे दिये। मेरे पैर अब उन जूतों मे जा टीके हैं।मैंने एक लंबा रास्ता ले लिया है। मैं आगे बढ़ चुका हूँ। जिम्मेदारियों से भरे उस रास्ते को मैं महसूस कर पा रहा हूँ। वो जिम्मेदारियाँ उन जूतों पर भारी पड़ रही हैं। वो जूते फटेंगे तो नहीं ? शायद नहीं। पापा भी तो यही जूते पहनते थे? अब वो क्या पहनते हैं?

मैं अपने लिए हर नए जूते की बात माँ से ही करता था। मुझे पता हीं नहीं था कि मैं पापा से भी यह सब कुछ बोल सकता हूँ। जब मैं माँ से 2 या 4 रुपए मांगा करता था तो माँ अक्सर कहती थी कि पापा घर मे होते हैं तब क्यूँ नहीं बोलते हो? मैंने समोसे भी कभी खुलकर पापा से नहीं मांगे हैं। पर वो खुद ही लाया करते थे। मैं बस खाया करता था। फादर्स डे, पिता के लिए। मैंने आज तक कभी खुलकर उन्हे विश नहीं किया। आज सुबह बात हुई मेरी। करीब 10 दिन बाद। मेरे काम को लेकर परेशान रहते हैं। उनकी नजर मे शायद मैंने रास्ता थोड़ा ज्यादा मुश्किल चुन लिया है। पर मुझे पूरी उम्मीद है। उन्हे भरोसा है। मुझे पता है पापा से जो जूते मुझे मिले हैं वो इतने कमजोर नहीं हैं।

इस फादर्स डे एक शॉर्ट फिल्म डेडीकेट कर रहा हूँ। आज हीं देखा। सुगंधा गर्ग निर्देशित यह फिल्म पापा और बेटे के ऊपर आधारित है। मानव कौल ने बेहतरीन काम किया है। अभी ज्यादा नहीं बोलूँगा बस आप फिल्म देखिये।

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