आज का भारत अखंड होके भी कई तरह से खंडित है और इसे खंडित बनाते हैं हम और आप जैसे लोग जो की भाषा और धर्म के नाम पर एक दुसरे को अपने और पराये के नज़रिए से देखते हैं. पर इस युग में भी कई ऐसे लोग हैं जो इन सब चीज़ों से ऊपर मानवता को मानते हैं और उसके लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं .ऐसा ही एक वाकया जम्मू में हुआ जहाँ एक सिख समुदाय की लड़की ने मुस्लिम धर्म की लड़की को अपना किडनी दान देने का निश्चय किया है जिसकी उससे सख्त ज़रुरत थी.

समरीन और मनजोत. फोटो साभार: इन्टरनेट

23 वर्षीय मनजोत सिंह अपनी किडनी समरीन को डोनेट करना चाहती हैं जो की किडनी की बीमारी से जूझ रही हैं. हलाकि अथॉरिटी ने अभी इसे मंज़ूरी नहीं दि है क्योंकि डोनर यानी मनजोत के पिता ने किडनी डोनेट करने की मंजूरी नहीं दी है.

मनजोत ने कहा

“हम उन्हें दोष नहीं दे सकते (परिवार)। वे भावनात्मक रूप से अपने बच्चे से जुड़े हुए हैं। मैं नहीं कह सकती कि वे गलत हैं। उनके दृष्टिकोण से वे जो कर रहे हैं, सही है। लेकिन मुझे लगता है कि हमे भावनाओं से ऊपर उठना चाहिये,  हमें वह करना चाहिए जिसके लिए भगवान ने हमें भेजा है। मैं बालिग हूँ और मैं अपने फैसले ले सकती हूं”.

उधमपुर में रहने वाली मनजोत की मुलाक़ात समरीन से 4 साल पहले हुई थी और तभी से ये दोनों दोस्त हैं. मनजोत एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और समरीन ने कई कार्यकर्म में मनजोत के साथ हिस्सा लिया जिसके बाद दोनों एक अच्छी दोस्त बन गयी. करीब 5 महीने पहले मनजोत ने एक कॉमन दोस्त का स्टेटस पढ़ा जो की समरीन के बीमारी के ऊपर था जिसके बाद मनजोत अगले दिन समरीन से मिलने चली गयी.

मुख़्तार अहमद मालिक, जो समरीन के पिता हैं उनका कहना है

“मैं एक साधारण दर्जी हूँ और इलाज के लिए 7-8 लाख रुपये खर्च कर चुका हूं। लेकिन उसकी हालत दिन प्रतिदिन बिगड़ रही है। मनजोत ने किडनी की पेशकश करने और सभी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद भी उनके पिता स्वीकार नहीं कर रहे हैं। मैंने उससे बात की है कि परिवार उसकी प्राथमिकता है और उसे वापस जाना चाहिए”

मनजोत ने न्यूज़ एजेंसी “द टेलीग्राफ” से बात करते हुए बताया “मैं डर नहीं रही हूँ। मेरी एकमात्र चिंता यह है कि मानवता को खोना नहीं चाहिए। मेरा परिवार भावना से प्रभावित हो गया है … लेकिन मैं आगे बढुंगी”.

समरीन और मनजोत. फोटो साभार: इन्टरनेट

यह खबर हो सकता है की आपके लिए मामूली हो. पर देश में जो हालात अब हैं और जितना जहर यहाँ की आबो हवा में घुलता जा रहा है, इस स्थिति में मनजोत ने जो काम किया है वह हमारे देश के साम्प्रदायिक सौहार्द को एक नयी जान देने जैसा है. हमारे समाज को मनजोत जैसे लोगो की ज़रुरत हैं जो की मदद करने से पहले ये नहीं देखते की सामने वाला कौन सा मज़हब का है. ऐसे ही भारत की हमे ज़रुरत है जो सिर्फ उसके संस्कृतियों के लिए नहीं बल्कि अखंडता और एकता के लिए भी जाना जाए.

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