उत्तराखंड अपने पर्यावरण, प्राकृतिक सौंदर्य, संस्कृति, खानपान, पर्यटन स्थल, विविधता आदि के लिए विश्व प्रसिद्ध है। उत्तराखंड को देवों की भूमि के नाम से भी जाना जाता है, जहां कई देवताओं ने तप करके इस धरती को पवित्र बनाया है। भगीरथ ने भी अपने पित्रों को मोक्ष दिलाने के लिए उत्तराखंड में ही हजारों वर्षों तक तप किया था। महाभारत युद्ध के बाद स्वर्ग की तलाश में पांचों पांडवों ने उत्तराखंड का रुख किया था। हरिद्वार सहित उत्तराखंड के विभिन्न स्थानों पर आज भी पांडवों के आने के प्रमाण मिलते हैं। उत्तराखंड को भगवान शिव की प्रिय नगरी भी कहा गया है। उत्तराखंड के हरिद्वार में ही भगवान शिव का ससुराल भी है।
पार्वती ने शिव को प्राप्त करने के लिए जिस स्थान पर तप किया था वह स्थान भी हरिद्वार है।

हरिद्वार

उत्तराखंड में कई पौराणिक तीर्थ स्थल हैं, जहां जाकर इंसान को शांति की अनुभूति होती है। इसके अलावा उत्तराखंड को नदियों की नगर भी कहा जाता है। यहां से कल कल निनाद करते हुए बहती सैंकड़ों नदियों संपूर्ण भारत की जीवन रेखा की तरह कार्य करती है। यहां कई स्थानों पर मन को मोह लेने वाले नदियों के कई संगम भी हैं। जिनमें से पांच स्थानों को पंच प्रयाग के नाम से जाना जाता है। इन पांचो स्थानों पर विभिन्न नदियों के संगम हैं।

देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी नदी के संगम को सबसे ज्यादा महत्ता दी गई है। क्योंकि अलकनंदा और भागीरथी का संगम होने के बाद ही इस स्थान से गंगा नदी का जन्म होता है। जो गंगा सागर तक सैंकड़ों नदियों के जल को अपने में समाहित करते हुए सागर में मिल जाती है।
देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का पवित्र संगम है।

देवप्रयाग

उत्तराखंड के प्रसिद्ध पांच प्रयागों में से देवप्रयाग समुद्र तल से 2266 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का पवित्र संगम है। संगम की ऊंचाई समुद्र तल से 1953 फीट है। संगम के समीप ही प्राचीनकाल में तराशे हुए पत्थरों से बनाया गया रघुनाथ मंदिर स्थित है। मंदिर के शिखर पर सोने का कलश, गर्भग्रह में आभूषणों से सुशोभित भगवान राम की मूर्ति है। मंदिर में भगवान राम की मूर्ति के साथ माता सीता और लक्ष्मण की मूर्ति भी है। मंदिर के बाहर गरुड़ की पीतल की मूर्ति है।

देवप्रयाग के बारे में ऐसी मान्यता है कि सतयुग में देव शर्मा नामक मुनि के नाम पर इस स्थान का नाम देवप्रयाग रखा गया है।

पौराणिक कथा

सतयुग में देव शर्मा नामक मुनि ने दस हजार वर्ष तक पत्ते खाकर और एक हजार वर्ष तक एक पैर पर खड़े होकर देव प्रयाग में भगवान विष्णु की तपस्या की थी। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने मुनि को मनचाहा वर मांगने के लिए कहा। मुनि ने वरदान के तौर पर मांगा कि ‘यह स्थान संपूर्ण पापों का नाश करने वाला हो, इस क्षेत्र मे आपकी पूजा अर्चना करने वाले व्यक्ति को परमगति प्राप्त हो और हमारी प्रीति सदा आपके चरणों में रहे। वरदान देते हुए भगवान विष्णु ने कहा कि मैं त्रेतायुग में दशरथ के पुत्र के रूप में जन्म लूंगा और रावण का वध करके इसी स्थान पर आऊंगा। मुति तुम तब तक इसी स्थान पर निवास करो।

भगवान विष्णु ने अपने कथन के अनुसार दशरथ के पुत्र के रूप में जन्म लेकर रावण का वध किया और देवप्रयाग में आकर मुनि को दर्शन दिए। भगवान ने कहा कि हे मुति ! तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी और यह स्थान तीनों लोकों में प्रसिद्ध होगा। जिस कारण अगे चलकर इस स्थान का नाम देव शर्मा मुनि के नाम पर देव प्रयाग पड़ा। नारदपुराण और स्कंदपुराण में देव प्रयाग का वर्णन मिलता है।

देवप्रयाग में संगम स्थल पर स्नान करने के बाद पाप का नाश होता है और इंसान को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी मान्यता का अनुपालन करते हुए हर साल लाखों लोग संगम स्थल पर स्नान पर पुण्य की प्राप्त कर सुख समृद्धि की कामना करते हैं।

बरसात के मौसम पानी के साथ भारी मात्रा में मिट्टी आने के कारण कई बार लोगों को लिए अलकनंदा और भागरथी के जल में भेद करना मुश्किल हो जाता है। लेकिन सामान्य दिनों में भागरथी का पानी हरे व नीले और अलकनंदा का पानी मटमैले रंग को दिखाई देता है।

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