जून की चिलचिलाती धूप में गांधी परिवार संगम की ओर रवाना हुआ। यह वही जगह है जहां पर लोग अपने पाप धोने को आकांक्षा लेकर आते हैं। यह एक पर्व की तरह होता है जिसे कुंभ का नाम दिया गया है। पंडित ने कुछ मंत्र पढ़ने के बाद तांबे का अस्थिपात्र राहुल को थमा दिया। राहुल ने संगम पर जाकर पात्र को उलट दिया। इसी के साथ भारत के युवा प्रधानमंत्री जिसने कभी भारत को तकनीकी रूप से मजबूत बनाने का सपना देखा था वह अपने सपने के साथ कलकल करती जलधारा में विलीन हो गया।

सोनिया-राजीव

सोनिया मात्र 18 साल की थी जब कैंब्रिज विश्वविद्यालय में वे राजीव के सम्मोहक नयनों का शिकार हुई। बेहद खूबसूरत सोनिया को लोग देखते तो बस देखते ही रह जाते। राजीव सोनिया से एक कैफे में मिले और पहली मुलाकात में ही उन्होंने तय कर लिया कि उनकी जीवनसाथी सोनिया ही होंगी। इस बात की परवाह किए बिना की कि धर्म, मान्यता, रीति रिवाज को गहराई से मानने वाला भारत शायद ही सोनिया को बहू का दर्जा दे। आने वाले वर्षों में सब ठीक हो गया। राजनैतिक ताकतों के अलावा कभी भी भारत ने सोनिया को विदेशी नहीं माना और उतना ही प्यार दिया जितना कि अपने देश की बहू-बेटियों को मिलता है।

राजनीतिक परिवेश में पलने के बावजूद राजीव कभी राजनीति के प्रति आकर्षित नहीं हुए। हालांकि अपनी मां को वे सलाह जरूर देते थे लेकिन तब जब वे हर जगह से निराश हो जातीं थीं। राजीव को जहाजों से और अपने परिवार से बेपनाह प्रेम था उन्होंने पायलट बनने के लिए कड़ी ट्रेनिंग की। राजीव गांधी अपने परिवार के साथ राजनीति से दूर रहने का मन बना चुके थे लेकिन भाग्य कहां पीछा छोड़ता है। वही हुआ जिसको लेकर सोनिया के भीतर हमेशा डर बना हुआ था। अचानक बदले राजनीतिक परिदृश्य ने राजीव को भारत और कांग्रेस का नेतृत्व करने पर मजबूर कर दिया।

राजीव गांधी कभी-भी अपने आप को सोनिया से किये उस वादे के लिए माफ नहीं कर पाये। जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि वे कभी सक्रिय राजनीति नहीं करेंगे। सोनिया और राजीव एक दूसरे को अथाह प्रेम करते थे।

राजीव भारत की गरीबी से परेशान रहते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि काश! हम इन गरीबों को सैटेलाइट से जुड़ा एक फोन ही दे पाते। तो शायद ये सूचना क्रांति का हिस्सा बन जाते। जब इन तक सूचना व्यवस्थित और सुचारू तरीके से पहुंचने लगेगी तो ये जागरूक बनेंगे और जागरूक होने पर इनकी गरीबी दूर करने के प्रयास सफल हो सकेंगे।

‘राजनीति तो कभी मेरे लिए थी ही नहीं। मैं तो इसलिए खड़ा ही रहा हूँ कि मुझे अपनी मां की मदद करनी थी। वह मां जिसे वे इस कायनात में सबसे ज्यादा प्रेम करते थे।’

प्रधानमंत्री के पुत्र राजीव हमेशा राजनीति से दूर रहना चाहते थे। यह पिंजरा उन्हें कभी अच्छा नहीं लगता था। जहां वे अपनी मर्जी से सांस तक न ले सकें। जहां हर शब्द, भाव, कार्य के पीछे कूटनीतिक हितार्थ निकाले जाते रहे हों। लेकिन उन्हें इस दलदल में फंसना पड़ा। अंततः वे उसी का शिकार हुए।

संगम तट पर अस्थि-विसर्जन के बाद राहुल और प्रियंका ने सोनिया के दोनों कंधों पर अपना सिर टिका दिया। लेकिन सोनिया के पास दोनों को सांत्वना देने के लिए शब्द नहीं थे। वे अपने आंखों से झरते अश्रु नीर के बीच भारत की महान नदी गंगा की पवित्रता में घुल रही अस्थि राख को देख रहीं थीं। जिसे विश्व की सबसे पावन नदी बनाने का बीड़ा कभी उनके पति ने उठाया था।

कच्चा चिट्ठा के लिये यह आर्टिकल दुर्गेश तिवारी ने किया है।

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