डीएमके के नेता और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री करूणानिधि का निधन हो चुका है और अब उनके अंतिम दर्शन के लिए पीएम मोदी से लेकर राहुल गांधी जैसे बड़े बड़े नेता पहुँच रहे हैं. इसकी वजह है करूणानिधि का भारतीय राजनीति में पहुँच और सम्मान। उनके द्वारा किये गए काम जिसने उन्हें जनता का हीरो बना दिया और पूरी ज़िन्दगी में किसी भी चुनाव में उन्होंने हार का मुंह नहीं देखा।

काला चश्मा पहचान थी करूणानिधि की. फोटो साभार: इंटरनेट

इन तमाम बातों के अलावे एक और बात है जिसके लिए करूणानिधि को याद किया जाएगा और वह है उनका फैशन स्टेटमेंट। करूणानिधि की एक ख़ास पहचान थी, पीला शाल और काला चश्मा। इन दो चीजों के बिना आपने शायद ही कभी उन्हें देखा होगा। तमिलनाडु के कई नेताओं ने इस मामले में करूणानिधि की नकल की है लेकिन उनकी बराबरी नहीं कर पाए. दरअसल करूणानिधि अपने फैशन स्टेटमेंट को लेकर बेहद ही संजीदा रहते थे. यही वजह है कि उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए पीली शाल ओढ़नी शुरू कर दी जोकि बाद में उनकी पहचान बनी भी.

वैसे आपको बता दें कि साल 1957 में जब पहली बार विधानसभा पहुंचे थे तब उन्होंने चश्मा पहनना शुरू नहीं किया था. चश्मा पहनने की शुरुआत उन्होंने साल 1960 से की. इसकी वजह  एक एक्‍सीडेंट था जिसमें उनकी बाईं आंख खराब हो गई. इस कारण पहले मजबूरी में उन्‍होंने काले चश्‍मे को पहनना शुरू किया ले‍किन बाद में करूणानिधि को वह चश्मा इतना पसंद आ गया कि लगभग आधी सदी तक उन्होंने उस चश्मे को धारण किया रहा.

अपने पीले शाल और चश्मे के बिना वो शायद ही किसी सार्वजनिक जगहों पर जाय करते थे. फोटो साभार: इंटरनेट।

इसे महज एक संयोग ही कहा जा सकता है कि करूणानिधि के विरोधी रहे अन्‍नाद्रमुक नेता एमजी रामचंद्रन भी काला चश्‍मा पहनते थे. ये वही एमजी रामचंद्रन थे जिन्हें जयललिता अपना राजनीतिक गुरु माना करती थीं.

काले चश्मे को अलविदा और नए चश्मे की एंट्री।

साल 2017 में करूणानिधि ने अपने काले चश्मे को अलविदा कह दिया। जब इसे बदला गया तो मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उनका चश्मा चेन्नई के विजया ऑप्टिक्स ने जर्मनी से इम्पोर्ट किया था. विजय ऑप्टिक्स को करुणानिधि के पसंद का चश्मा खोजने के लिए जर्मनी में 40 दिन तक खोज करनी पड़ी थी और तब जाकर ये चश्मा मिला. कहा जाता है कि करूणानिधि अपने काले चश्मे को बदलना नहीं चाहते थे, पर डॉक्टर की सलाह पर उन्हें मजबूरी में इसे बदलना पड़ा. पुराने चश्मे का वजन भी ज्यादा था और वह उतना सुविधाजनक नहीं था.

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