भारतीय राजनीति में जब जब चुनाव नजदीक आते हैं तब तब नेताओं को राम याद आते हैं. या फिर ये भी कहा जा सकता है की चुनाव भी तो हर साल आते हैं तो राम को याद ही कब किया जाये? खैर जो भी है पर ये बात तो हमें और आपको माननी ही होगी की हमारे देश के नेताओं में सत्ता के लिए भगवान् का इस्तेमाल करने का जो हुनर है, वो शायद और कहीं न हो.

बाबरी मस्जिद. फोटो साभार: इन्टरनेट

जैसे जैसे आम चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है राम मंदिर का शोर तेज होता जा रहा है. विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल जैसे कट्टर हिंदुत्व दलों ने अयोध्या में डेरा डाला हुआ है. भाजपा की तरफ से भी राम मंदिर के मुद्दे को लेकर लगातार बयानबाजी की जा रही है. कई दलों और हस्तियों ने सरकार पर दबाव भी बनाया हुआ है की भाजपा अध्यादेश लाकर राम मंदिर का निर्माण करवाए. कुल मिला के देखें तो आज के माहौल में आपको ऐसा महसूस होगा की राम मंदिर को बनवाने के लिए सबसे ज्यादा उतावली पार्टी भाजपा ही है.

पर राम मंदिर बनवाने के मामले में भाजपा का दोहरा चरित्र नजर आता है. ऐसा इसलिए क्योंकि आज से 25 साल पहले कांग्रेस सरकार ने ऐसा ही एक अध्यादेश मस्जिद गिराए जाने के एक महीने बाद जारी किया था और तब बीजेपी वो पार्टी थी जिसने इसका विरोध किया था.

फोटो साभार: इन्टरनेट.

आपको बता दें कि मंदिर बनाए जाने के लिए अध्यादेश लाना कोई नई बात नहीं है. केंद्र की बीजेपी सरकार भले ही अभी इसके लिए विचार कर रही हो. लेकिन करीब 25 साल पहले ही कांग्रेस सरकार अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश ला चुकी है. यह जनवरी, 1993 में हुआ था. मतलब बाबरी मस्जिद गिराए जाने के केवल एक महीने बाद. उस समय पीवी नरसिम्हाराव देश के प्रधानमंत्री थे.

7 जनवरी, 1993 को राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने भी इसे मंजूरी दे दी थी. बाद में एक तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने इस बिल को मंजूरी के लिए लोकसभा के सामने रखा था. पास होने के बाद इसे अयोध्या अधिनियम कहा गया था. हालांकि उस वक्त बीजेपी ने इसका विरोध किया था.

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिल को पेश करते हुए तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने कहा था, “देश के लोगों में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की भावना बनाए रखना जरूरी है.” नरसिम्हा राव सरकार इस अधिनियम के जरिए 2.77 एकड़ की विवादित भूमि ही नहीं बल्कि इसके चारों ओर की 60.70 एकड़ जमीन भी अधिग्रहीत कर रही थी. इस पर कांग्रेस सरकार राम मंदिर, एक मस्जिद, म्यूजियम और अन्य सुविधाओं का निर्माण करना चाहती थी.

भूतपूर्व प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव. फोटो साभार: इन्टरनेट.

आज जो भाजपा खुद को छाती ठोक कर राम मंदिर का हितैषी बताती फिरती है. इसी भाजपा ने उस वक्त प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का खुलकर विरोध किया था. उस समय के भाजपा उपाध्यक्ष एसएस भंडारी ने तो इस कानून को पक्षपातपूर्ण, तुच्छ और प्रतिकूल बताते हुए खारिज कर दिया था.  सिर्फ भाजपा ही नहीं बल्कि कई मुस्लिम संगठनों ने भी तब इस कानून का विरोध किया था.

सुप्रीम कोर्ट की वजह से अटक गया मामला.

तब के प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव की सरकार ने अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से इस मुद्दे पर सलाह मांगी थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कोई भी राय देने से मना कर दिया था. तब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की विवादित जमीन पर पहले कोई हिंदू मंदिर या हिंदू ढांचा था? सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों (जस्टिस एमएन वेंकटचलैया, जेएस वर्मा, जीएन रे, एएम अहमदी और एसपी भरूचा) की खंडपीठ ने इन सवालों पर विचार तो किया लेकिन इसका कोई जवाब नहीं दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या एक्ट 1994 की व्याख्या की थी. सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से तय किए फैसले में एक्ट के एक खंड को रद्द कर दिया था जिसमें इस मामले में चल रही सारी सुनवाईयों को खत्म किए जाने की बात कही गई थी. हालांकि अयोध्या एक्ट रद्द नहीं किया गया था.

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहित जमीन पर एक राम मंदिर, एक मस्जिद और लाइब्रेरी और दूसरी सुविधाओं के इंतजाम की बात का समर्थन किया था लेकिन इस आदेश को राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं बताया था, जिसके चलते अयोध्या एक्ट लटक गया और व्यर्थ हो गया.

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