फूलों की खुशबू की तरह ही फूलों को देखकर लोगों के चेहरे पर अमूल्य मुस्कान आ जाती है। फूल लोगों को सकारात्मकता (पाॅजिविटी) से भर देते हैं। साथ ही फूलों को प्यार, स्नेह, नवजीवन और खुशहाली का प्रतीक भी माना गया है।

दुनिया में मौजूद विभिन्न प्रकार के फूल लोगों को कांटों के बीच रहकर भी सभी को सुगंधित करने की प्ररेणा देते हैं और पत्थरों के बीच रहकर न हारने की प्रेरणा देने का कार्य भी करते हैं। लेकिन इन फूलों की संख्या और दायरा आधुनिकता की दौड़ में कम होता जा रहा है। जिस कारण पुराने समय में अधिकांश लोगों के आंगन में खिलने वाले फूल कुछ ही लोगों के घरों और बाग तक सीमित रह गए हैं। लेकिन इन सभी के बीच उत्तराखंड में फूलों की घाटी पूरी दुनिया में अपनी एक अनोखी छटा बिखेरे हुए हैं।
सोर्स- गूगल
जहां जाने वाले हर शख्स को जन्नत का एहसास होता है और यहां आने के बाद हर व्यक्ति प्रकृति से इश्क कर बैठता है। प्रकृति के इस इश्क में व्यक्ति जीवन के सभी गमों को भूलकर एकाग्र होकर प्रकृति की सुंदरता को निहारता रहता है और जीवन जीने की एक नई सीख प्रकृति और फूलों से लेकर जाता है।

फूलों की घाटी उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है।

फूलों की घाटी का सबसे पहले पता 1931 में ब्रिटिश पर्वतारोही फ्रैंक एस स्मिथ और आरएल होल्डसवर्थ को कामेट पर्वत से अभियान से लौटते वक्त लगा था।
वर्ष 1938 में ‘वैली आॅफ फ्लाॅवर्स’ नाम से एक पुस्तक लिखी गई।
यहां की मंत्रमुग्ध कर देने वाली खूबसूरती को देखकर वह दोनों प्रकृति के प्रेम में खो गए थे। इसके बाद फूलों की घाटी सुंदरता को रूबरू होने के लिए वह वर्ष 1937 को फिर से यहां लौटे और वर्ष 1938 में ‘वैली आॅफ फ्लाॅवर्स’ नाम से एक पुस्तक लिखी।

फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान और नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान को यूनेस्को ने विश्व धरोहर में संयुक्त रूप से शामिल किया है।

यह उद्यान लगभग 87.50 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। फूलों की घाटी में 500 से अधिक प्रकार की फूलों की प्रजाती के लाखों फूल वातावरण के साथ ही लोगों के मन को भी सुगंधित करते हैं। ऐसी मान्यता है कि रामायण काल में हनुमान संजीवनी की तलाश में इसी घाटी में पधारे थे। यहां उपलब्ध विभिन्न प्रकार की फूलों की प्रजातियों का इस्तेमाल दवाइयां बनाने में भी किया जाता है। हांलाकि फूलों की घाटी को वर्ष 1982 में ही राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया था।

कैसे पहुंचे

फूलों की घाटी की दूरी हरिद्वार से लगभग 300 किलोमीटर है। हरिद्वार से सड़क मार्ग से बदरीनाथ से 20 मिलोमीटर पहले गोविंदघाट तक पहुंचा जा सकता है। गोविंदघाट से फूलों की घाटी तक लगभग 46 किलोमीटर (गोविंद घाट से घांघरिया 13 किमी और घांघरिया से फूलों की घाटी तक 10 किमी)। फूलों की घाटी के ट्रैक को पैदल पूरा करने में 3 से 4 दिन का समय लग सकता है।

घूमने का सही समय

चमोली की फूलों की घाटी में प्रकृति की अलौकिक सुंदरता का दीदार करने के लिए जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर का महीन सर्वोत्तम माना जाता है। सितंबर के महीनें में उत्तराखंड का राज्य पुष्प ब्रह्मकमल खिलता है, इसलिए अधिकांश लोग सितंबर माह में यहां आते हैं। नवंबर के पहले सप्ताह तक फूलों की घाटी बर्फ से ढंक जाने के कारण यह मार्ग पर्यटकों के लिए बंद कर दिया जाता है।

पायी जाने वाली फूलों की प्रजातियां

नवम्बर से मई माह के मध्य घाटी सामान्यतः हिमाच्छादित रहती है। जुलाई एवं अगस्त माह के दौरान एल्पाइन जड़ी की छाल की पंखुडियों में रंग छिपे रहते हैं। यहाँ सामान्यतः पाये जाने वाले फूलों के पौधों में एनीमोन, जर्मेनियम, मार्श, गेंदा, प्रिभुला, पोटेन्टिला, जिउम, तारक, लिलियम, हिमालयी नीला पोस्त, बछनाग, डेलफिनियम, रानुनकुलस, कोरिडालिस, इन्डुला, सौसुरिया, कम्पानुला, पेडिक्युलरिस, मोरिना, इम्पेटिनस, बिस्टोरटा, लिगुलारिया, अनाफलिस, सैक्सिफागा, लोबिलिया, थर्मोपसिस, ट्रौलियस, एक्युलेगिया, कोडोनोपसिस, डैक्टाइलोरहिज्म, साइप्रिपेडियम, स्ट्राबेरी एवं रोडोडियोड्रान इत्यादि प्रमुख हैं।

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